विश्वकर्मा : भारत की श्रम साधना के आदि देवता

विश्वकर्मा : भारत की श्रम साधना के आदि देवता

रिपोर्ट - प्रेम शंकर पाण्डेय 

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किसी भी सभ्यता की उन्नति का मूल्यांकन उसके द्वारा बनाए गए स्मारकों, यंत्रों और व्यवस्थाओं से होता है। और हर निर्माण के पीछे एक अदृश्य हाथ होता है, एक कल्पनाशील मस्तिष्क होता है। भारतीय मनीषा ने इसी अदृश्य सृजन शक्ति को एक नाम दिया - विश्वकर्मा। विश्वकर्मा पूजा केवल एक मूर्ति की पूजा नहीं, बल्कि उस सृजन चेतना की आराधना है जो मनुष्य को शिल्पी बनाती है। ऋग्वेद के दशम मंडल में विश्वकर्मा सूक्त है, जिसमें उन्हें स्पष्ट रूप से कहा गया है .....

विश्वकर्मा विमना आद्विहाया धाता विधाता परमोत संदृक।

अर्थात वे सम्पूर्ण ब्रह्मांड को रचने वाले, धारण करने वाले और सर्वोच्च सत्य को देखने वाले हैं। वे निराकार ब्रह्म के साकार शिल्पी हैं। पुराणों मे वर्णित तथ्यों के अनुसार विश्वकर्मा जी के पाँच पुत्र हुए - मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवज्ञ। इन्हीं पाँचों से लौहकर्म, काष्ठकर्म, प्रस्तरकर्म, स्वर्णकर्म और स्थापत्यकर्म की पाँच महान धाराएँ प्रवाहित हुईं। इसी कारण इन कार्यों से जुड़े लोग स्वयं को विश्वकर्मा का वंशज मानते हैं।

सामान्य जन इसे 17 सितंबर की निश्चित तिथि मानते हैं, पर इसका आधार विशुद्ध वैज्ञानिक और ज्योतिषीय है। भारतीय सौर कैलेंडर में जब सूर्य सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, उस दिन कन्या संक्रांति होती है। कन्या राशि का स्वामी बुध है, जो बुद्धि, वाणिज्य और तकनीक का कारक है। शिल्प के अधिपति का पूजन बुद्धि के कारक में सूर्य के प्रवेश पर होना, यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सुविचारित विधान है। इस वर्ष 2026 में कन्या संक्रांति आज, 17 सितंबर, गुरुवार को है। इस दिन भारत के औद्योगिक मानचित्र पर एक अलग ही दृश्य होता है। यह कारखानों के लिए दीपावली से कम नहीं। सुबह से ही मशीनों को जल से स्नान कराया जाता है। उन पर हल्दी-कुमकुम का तिलक किया जाता है। हथौड़े से लेकर क्रेन तक, फावड़े से लेकर कंप्यूटर नियंत्रित लेथ मशीन तक, हर यंत्र को पुष्पमाला पहनाई जाती है।

इसका दर्शन बहुत गहरा है। हम उस यंत्र को प्रणाम करते हैं जो हमें रोजगार देता है। इस दिन उत्पादन पूरी तरह बंद रहता है। यह इस बात का प्रतीक है कि उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ में भी, यंत्र को भी विश्राम का अधिकार है। इस एक दिन मालिक और श्रमिक का भेद मिट जाता है, दोनों एक ही पंक्ति में बैठकर आरती करते हैं। आज जब राष्ट्र आत्मनिर्भरता और कौशल विकास की बात कर रहा है, तब विश्वकर्मा पूजा का संदेश सबसे अधिक प्रासंगिक हो जाता है। हमारा देश केवल सूचना प्रौद्योगिकी से नहीं, बल्कि कुशल हाथों से विश्वगुरु बनेगा।

पश्चिम में श्रम को मजबूरी माना गया, जबकि भारत में श्रम को साधना माना गया। गीता में कृष्ण ने कहा है - *योग: कर्मसु कौशलम्।* कर्म में कुशलता ही योग है। विश्वकर्मा पूजा इसी कर्म-कौशल के योग की सिद्धि है। यह हमें याद दिलाता है कि एक सड़क बनाने वाले मजदूर का श्रम,एक उच्च पदस्थ अधिकारी एवं कर्मचारी के श्रम जितना ही पवित्र एवं समान है। विश्वकर्मा पूजा हमें भौतिकता के बीच अध्यात्म का मार्ग दिखाती है। यह सिखाती है कि औजारों की पूजा करने से पहले अपने हाथों में ईमानदारी और मन में पवित्रता लानी चाहिए। सच्चा शिल्पी वही है जो अपने हर उत्पाद में अपना हृदय रख दे।

प्रस्तुति ....अमित कुमार गुप्त
आवास.....बेलौली बाजार, मधुबन, जनपद - मऊ (उ.प्र.)
मो.न. .....8400117266