भारतीय गणतंत्र : संविधान द्वारा निर्धारित मूल्यों को अपनाने का दिन
रिपोर्ट -- प्रेम शंकर पाण्डेय
भारत इस साल अपना 77 वां गणतंत्र दिवस 26 जनवरी 2026 को मनाएगा। यह वार्षिक आयोजन 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान को अपनाने की याद में मनाया जाता है, जिसने भारत को एक संप्रभु गणराज्य बनाया।
वैसे तो भारत को 15 अगस्त 1947 कोस्व तंत्रता मिली लेकिन तब तक भारत के पास अपना कोई संविधान नहीं था बल्कि भारत सरकार के कानून मुख्य रूप से भारत सरकार अधिनियम 1935 पर आधारित थे जो अंग्रेजों के बनाए हुए थे, बाद में 29 अगस्त 1947 को हमारे देश का स्वतंत्र संविधान बनाने के लिए डॉ. भीम राव अंबेडकर की अध्यक्षता में मसौदा समिति द्वारा संविधान लिखने की प्रकिया शुरू की गई।
भारतीय संविधान को तैयार होने में कुल 2 साल और 11 महीने का समय लगा और अंततः 26 जनवरी 1950 को देश में हमारा भारतीय संविधान लागू हुआ। ज्ञात हो कि 26 जनवरी की तारीख इसलिए चुनी गई क्योंकि 1930 में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के तहत पूर्ण स्वराज की घोषणा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा इसी तारीख़ को की गई थी।
26 जनवरी 1950 को देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने 21 तोपों की सलामी के साथ ध्वजारोहण कर भारत को पूर्ण गणतंत्र घोषित किया था, यह ऐतिहासिक क्षणों में गिना जाने वाला समय था। इसके बाद से हर वर्ष इस दिन को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है तथा इस दिन देशभर में राष्ट्रीय अवकाश रहता है।
हमारा संविधान देश के नागरिकों को लोकतांत्रिक तरीके से अपनी सरकार चुनने का अधिकार देता है। संविधान लागू होने के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने पुराने संसद भवन के दरबार हॉल में राष्ट्रपति की शपथ ली थी और इसके बाद पांच मील लंबे परेड समारोह के बाद इरविन स्टेडियम में उन्होंने राष् ट्रीय ध् वज फहराया था।
भारत का गणतंत्र दिवस बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस दिन को चिह्नित करता है जब भारत 1950 में एक गणतंत्र बना था। इस दिन, भारतीय संविधान लागू हुआ, जिसने देश को अपने स्वयं के कानून और अधिकार दिए। यह भारत के एक उपनिवेश से एक स्वतंत्र और स्वतंत्र राष्ट्र बनने की यात्रा को दर्शाता है। गणतंत्र दिवस हमें हमारे नेताओं और स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा की गई कड़ी मेहनत और बलिदान की याद दिलाता है। यह लोकतंत्र, समानता और हमारे संविधान द्वारा निर्धारित मूल्यों का जश्न मनाने का दिन है, यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक नागरिक के पास अधिकार और स्वतंत्रता हो।
लोकतंत्र सरकार का एक ऐसा रूप है जिसमें जनता को अपने शासन संबंधी कानून चुनने का अधिकार होता है। गणतंत्र शब्द लैटिन शब्द रेस पब्लिका से लिया गया है, यह सरकार का एक ऐसा रूप है जिसमें देश को सार्वजनिक मामला माना जाता है।
आइए हम लोग लोकतंत्र और गणतंत्र के बीच के अंतर को समझते हैं। लोकतंत्र के 3 प्रमुख प्रकार हैं, (१) प्रत्यक्ष लोकतंत्र (२) प्रतिनिधि लोकतंत्र (३) संवैधानिक लोकतंत्र। इसी प्रकार गणराज्यों के भी 5 प्रकार हैं (1) संवैधानिक गणराज्य (2) संसदीय गणराज्य (3) राष्ट्रपति गणराज्य (4) संघीय गणराज्य (5) ईश्वरीय गणराज्य।
लोकतंत्र में सत्ता जनता के हाथ में होती है जबकि गणतंत्र में सत्ता व्यक्तिगत नागरिकों के हाथों में होती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून बहुमत द्वारा बनाए जाते हैं तो दूसरी ओर गणतंत्र प्रणाली में कानून जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा बनाए जाते हैं।
लोकतंत्र में बहुमत की इच्छा को मौजूदा अधिकारों पर हावी होने का अधिकार है जबकि गणतंत्र प्रणाली में बहुमत की इच्छा को दरकिनार नहीं किया जा सकता क्योंकि संविधान उन अधिकारों की रक्षा करेगा।
जैसा कि ऊपर वर्णन हुआ कि एक देश में एक से अधिक प्रकार के लोकतंत्र हो सकते हैं इसी तरह एक देश में एक से अधिक प्रकार के गणराज्य हो सकते हैं। लोकतंत्र में सरकार पर कोई प्रतिबंध नहीं होता जबकि गणतंत्र में सरकार पर प्रतिबंध होते हैं। लोकतंत्र में मुख्य ध्यान जनता की सामान्य इच्छा पर होता है तो दूसरी ओर गणतंत्र में मुख्य ध्यान संविधान पर होता है।
संविधान बनने के बाद से ही विपक्ष की ओर से सदैव ये आरोप लगाया जाता रहा है कि सत्ता पक्ष लोकतंत्र को कमज़ोर कर रही है, इसी तरह वर्तमान में भी विपक्ष निरन्तर आरोप लगा रहा है कि वर्तमान सरकार लोकतंत्र को खत्म कर रही है, विपक्ष की ओर से वोट चोरी का मुद्दा तूल पकड़ रहा है और जगह जगह इसको लेकर चर्चा गर्म है, इसी बीच एसआईआर को लेकर भी विपक्ष सरकार को और चुनाव आयोग को घेर रही है, ये मामला कहां जाकर खत्म होगा नहीं मालूम।
दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला भारत, दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था (जापान के साथ संयुक्त) होने का दावा करता है, लेकिन अपनी इतनी विशाल और अत्यधिक विविध अर्थव्यवस्था के बावजूद आज भी देश के अनेक हिस्से में गरीबी व्याप्त है।
आधुनिक भारत एक विविध आबादी का घर माना गया है, जिसमें कई धार्मिक समुदाय और अलग अलग भाषा और बोली बोलने वाले समूह सदियों से साथ रहता आया है। मगर इधर भारत की धर्मनिरपेक्ष पहचान और बहुलवाद तथा बहु संस्कृतिवाद की प्रतिष्ठा खतरे में दिखाई पड़ रही है और सामाजिक समूह समानता के मामले में निम्न - श्रेणी का प्रदर्शन करते दिखाई दे रहे है, जिसका एक कारण उन नीतियों की श्रृंखला है जो विशेष समुदाय को लक्षित कर रहे हैं तो दूसरी ओर कई राज्य सरकारों पर आरोप है कि उसकी बुलडोजर नीति भेदभाव के दायरे को बढ़ा रही है।
इसी प्रकार देश में कई चुनावों को लेकर चुनाव आयोग विपक्ष के निशाने पर है और उसके भरोसे पर भारी कमी पाई जा रही है जो लोकतन्त्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। इसी तरह अनेक जगहों पर विपक्ष सरकार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने का आरोप लगा रही है तो वहीं मीडिया पर सरकार के बढ़ते प्रभाव और दबाव तथा कथित नियंत्रण के कारण सरकार को विपक्ष की आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।
माना जाता है कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं मगर आश्चर्य है कि एक महिला प्रधानमंत्री और दो महिला राष्ट्रपति द्वारा देश का नेतृत्व करने के बावजूद, देश को लैंगिक असमानता, विशेष रूप से महिलाओं के खिलाफ हिंसा और भेदभाव से संबंधित समस्याओं को दूर करने में अब भी संघर्ष करना पड़ रहा है। हालाँकि हाल के वर्षों में एक सकारात्मक बदलाव आया कि महिलाओं का मतदान प्रतिशत अक्सर पुरुषों के मतदान प्रतिशत से अधिक होने लगा है और स्थानीय लैंगिक कोटा महिलाओं को सशक्त बनाने में सफल हो रहा है जो लोकतन्त्र को मजबूती दे रहे हैं।

लेखक
नज्जमुस्साकिब अब्बासी नदवी
सामाजिक कार्यकर्ता ,नया सवेरा फाउंडेशन गाजीपुर के संस्थापक हैं।
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